आधुनिक हिन्दी साहित्य : प्रकृति तथा पर्यावरण
Abstract
हिंदी साहित्य में प्रकृति और पर्यावरण में अंतर नहीं किया जाता जो किया जाना जरूरी है। प्रकृति और मनुष्य का साथ मनुष्य के इस धरती पर अस्तित्व के साथ ही है। मनुष्य ने अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए आरंभ में प्रकृति को समझने, उसे नियंत्रित करने और अनुकूल बनाने की कोशिश की। फिर भी प्रकृति के अनसुलझे जटिल रहस्यों के आगे उसे कई बार चमत्कृत होना पड़ा। बड़ी मात्रा में प्रकृति और उसकी शक्तियां मनुष्य के नियंत्रण से बाहर ही रहीं। मनुष्य प्रकृति की देखी-अनदेखी शक्तियों से डरा और उसे प्रसन्न करने के लिए उसकी वंदना में ऋचा गीत लिख डाले। दुर्दम्य प्रकृति को उसने उस मात्रा में अपने अनुकूल बना लिया जितना कि उसके जीवन रक्षा के लिए आवश्यक था। वेद की ऋचाएं हों या आदि कवि की वाणी, सबमें प्रकृति और मनुष्य का सहज संबंध व्यक्त है। रामायण-महाभारत, कालिदास, संस्कृत साहित्य की अन्य महाकाव्यात्मक कलेवर वाली रचनाओं में प्रकृति और मनुष्य का सहज संबंध नजर आता है।







